ISSN-2231 0495

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प्राच्य एवं पाश्चात्य शिक्षण पद्धतियों में समन्वय की आवश्यकताः शिक्षक-शिक्षा पाठ्‌यक्रम के संदर्भ में


प्राच्य एवं पाश्चात्य शिक्षण पद्धतियों में समन्वय  की आवश्यकताः 
शिक्षक-शिक्षा पाठ्‌यक्रम के संदर्भ में
सुनील कुमार उपाध्याय'   
अलका सक्सेना
'  
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, शिक्षक-शिक्षा विभाग, डी0बी0एस0 कालेज, कानपुर


सारांश

हम यदि वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं व स्वयं तथा समाज की भौतिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकताएं पूर्ण करना चाहते हैं तो पाश्चात्य शिक्षण पद्धतियों का प्राच्य शिक्षण पद्धतियों से समन्वय आवश्यक है। आधुनिक शैक्षिक तकनीक के साथ निदिध्यासन पर भी बल देना होगा। प्रयोगशालाओं में प्रयोग के साथ चित्त की वृत्तियों के निरोध हेतु योग के आष्टांगिक मार्ग का भी सहारा लेना होगा। इसी से हम धारणा, ध्यान व समाधि के रास्ते बुद्धि के साथ-साथ सम्बुद्धि तक का सफर तय कर पायेंगे। यहीं वह रास्ता है जो मन व शरीर के साथ-साथ आत्मा का भी विकास करता है, शील व सदाचार से युक्त विद्वता व पाण्डित्य की ओर ले जाता है और ज्ञान को मुक्ति का साधन बनाता है।

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वर्तमान शिक्षा पद्धति में पंतजलि योग शिक्षा पद्धति की उपादेयता

वर्तमान शिक्षा पद्धति में पंतजलि योग शिक्षा पद्धति की उपादेयता
डॉ० कीर्ति वर्मा
वरिष्ठ प्रवक्ता, प्रशिक्षण विभाग,
आचार्य नरेन्द्र देव नगर निगम,
महिला महाविद्यालय, हर्ष नगर, कानपुर


आधुनिकीकरण एवं पाश्चात्यीकरण के कारण जीवन के कमजोर पड़ते ढँाचे,, भौतिकवादी मनोवृत्ति, घर दफ्तर की नोकझोंक, शिखर चढ ती प्रतिस्पर्धा, दम तोड ती आशा, मन की टूटन आदि के कारण आज का युवावर्ग दिग्‌भ्रमित हो रहा है। परिणामस्वरूप बेचैनी, अकारण क्रोध, व्याकुलता, अवसाद, मानसिक एकाग्रता का अभाव, अकर्मण्यता, स्मृतिभ्रम, चिड चिड ापन, बोझिल रहना, नींद न आना आदि विविध समस्याओं से वह ग्रसित हो रहा है। तनाव से मुक्ति पाने के लिये सभी विशेषज्ञ ध्यान की अनुशंसा करते है। डॉ० राधाकृष्णन्‌ के शब्दों में - ''हम संसार के घटनाक्रम को और समाज में उत्पन्न हो रही उथल-पुथल को अपनी इच्छानुसार नहीं बदल सकते परन्तु हम अपने अन्दर इतना मनोबल अवश्य उत्पन्न कर सकते हैं कि उनका कोई प्रभाव हमें किसी प्रकार भी विचलित न कर सकें।''  मानव के उन्नयन, विकास एवं दृढ  इच्छाशक्ति के लिये आवश्यक है कि सर्वप्रथम वह अपने ध्येय को स्थान में रखने की बात सुनिश्चित करें। पतंजलि योग अपने उद्‌देश्य में पूर्णतः स्पष्ट है। इसकी आधारशिला त्रिकोणीय है और यह त्रिभुज त्रिनेत्रधारी शिव की तरह शाश्वत एवं मंगलकारी है। महर्षि पंतजलि के इस अमूल्य निधि को राजयोग एवं अष्टांग योग के नाम से भी जाना जाता है। यह एक ऐसा योग है कि जिसे संसार का प्रत्येक व्यक्ति निर्भय होकर पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ अपना सकता है तथा जीवन में पूर्ण सुख, शान्ति एवं आनन्द प्राप्त कर सकता है। यह कोई मत, पन्थ या सम्प्रदाय नहीं अपितु जीवन जीने की सम्पूर्ण पद्धति है। अष्टांग योग के द्वारा ही वैयक्तिक एवं सामाजिक समरसता, शारीरिक स्वास्थ्य, बौद्धिक जागरण, मानसिक शान्ति एवं आत्मिक आनन्द की अनुभूति प्राप्त होती है शिक्षा के सन्दर्भ में पंतजलि योग शिक्षा पद्धति के उद्‌देश्यों को इस प्रकार देखा जा सकता है -

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