ISSN-2231 0495

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महामना मालवीय के शैक्षिक विचार

 

 

महामना मालवीय के शैक्षिक विचार

बिहारी लाल
प्रधानाध्यापक
0 मा0 विधालय मोदीनगर मुगलसराय
चन्दौली 0प्र0
 

महामना पं मदन मोहन मालवीय शिक्षा को मानव विकास का मूल मानते थे। लेकिन उनकी शिक्षा की परिकल्पना मात्र डिग्री प्राप्त करने तक नहीं, बलिक व्यकित्व के सर्वागीण विकास के व्यापक उद्देश्य के निर्धारण हेतु थी। इसकी बुनियाद समग्र व्यक्तित्व, भौतिक एवं आध्यातिमक दोनों पक्षों के विकास से प्रेरित थी। महामना की दृष्टि  भारतीय परम्परा से ओतप्रोत नैतिकता तथा धर्मिक आचरण, भावनात्मक रूप से सुदृढ़ मानवीयता के प्रति आग्रह, बड़ो, विद्वानो तथा गुरुजनो के प्रति आदर, कला और सौदर्य के प्रति स्वभाविक प्रवृत्ति तथा देश-भक्तिसे ओतप्रोत पीढि़यों के निर्माण की थी। काशी हिन्दू विश्वविधालय उनकी इसी परिकल्पना का जीवंत मंदिर है। जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भातृत्व की भावना का विकास करें। मालवीय जी शिक्षा को ज्ञान प्राप्ति  और व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के विकास का साधन मानते थे।

शिक्षा को मनुष्य के सर्वांगीण  विकास के आधार के रूप में देखते है यथा - शारीरिक बल, मानसिक दक्षता एवं आध्यातिमक उन्नति। शिक्षा के द्वारा मनुष्य में निर्णय लेने की आंतरिक शकित का विकास होता है, उसमें नेतृत्व की क्षमता विकसित होती है।

शिक्षा यह निर्णय करने में सहायक होती है कि कब, कहाँ, कैसे, क्यों  और क्या व्यवहार या कार्य किया जा जाए। शिक्षा के बिना मनुष्य में बड़े-छोटे का सामान्य ज्ञान एवं शिष्टाचार का विकास नहीं हो सकता। मालवीय जी केवल ज्ञान, समझ एवं प्रयोग की क्षमता के विकास को ही शिक्षा की पूर्णता नहीं मानते थे, अपितु इसका मुख्य अर्थ  विचारोंएवं कार्यों की अभिव्यक्ति की शैली से लेते थे। शिक्षा किसी भी समाज के स्वरूप का परिचायक होती है। यह समाज की आवश्यकता के अनुरूपछात्रों  का निर्माण कर समाज रूपी भवन के लिए मजबूत आधार प्रदान करती है। इस प्रकार महामना शिक्षा के व्यावहारिक पक्ष पर भी जोर देते थे तथा व्यक्ति के समग्र विकास हेतु शिक्षा को अपरिहार्य भी मानते थे।

शिक्षा के उद्देश्य

महमना की सनातन धर्म में अटूट आस्था थी। ये इसे संसार का सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते थे। सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य जीवन के चार उद्देश्य है- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मालवीय जी शिक्षा के  उद्देश्य मनुष्य थे- शारीरिक विकास समाज एवं मानव सेवा की भावना का विकास, बौद्धिक एवं तार्किक क्षमता का विकास,  वैज्ञानिक दृष्टि कोण उत्पन्न करना, पेशेवर योग्यताओं का विकास, करना (रोजगारोन्मुख शिक्षा), नैतिक एवं चारित्रिक विकास द्वारा व्यäतिव निर्माण,  आध्यातिमक विकास एवं धार्मिक शिक्षा,  राष्ट्रीय चेतना का विकास एवं जनजागरण,  राष्ट्रीय एकता का संवर्धन ,  सांस्कृतिक  विकास, राजनैतिक जागरूकता का विकास।

महामना के शैक्षिक विचार

महामना के शैक्षिक विचार सार्वकालिक एवं चिरनवीन है। वर्तमान भारतीय समाज के लिए उपयुक्त शिक्षा प्रणाली के संबंध में ऊहा-पोह की सिथति से बाहर निकालने हेतु इनकी प्रासंगिकता उच्च कोटि की है। वर्तमान शिक्षा-जगत की कर्इ महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान महामना के शैक्षिक चिंतन में स्पष्ट मिलता है-

1  जन शिक्षा - महामना प्रत्येक व्यक्ति की शिक्षा को राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक मानते थे। किसी भी परिस्तिथि के कारण शैक्षिक अवसरों  की वंचना को वह राष्ट्र के लिए खतरनाक मानते थे। आज भारत सरकार भी प्रत्येक जन की शिक्षा एवं साक्षरता हेतु सर्व शिक्षा अभियान जैसे बड़े कार्यक्रम चला रही है। देश की प्रगति में जनता की निरक्षरता को बाधा के रूप में देखा जा रहा है। इस संदर्भ में महामना के विचारोंने प्रेरणा अवश्य दी है।

2  स्त्री शिक्षा संबंधी विचार - महामना एक महान शिक्षाविद तथा युगद्रष्टा भी थे। उन्होंने स्त्री शिक्षा की अनिवार्यता पर बल आज से सौ वर्ष पूर्व दिया था। उन्होंने 1926 र्इ में काशी हिन्दू विश्वविधालय में छात्राओं के लिए महिला महाविधालय की स्थापना की । छात्राओं के लिए छात्रावासों का बड़ी सख्या में प्रबंध किया। प्रत्येक प्रकार से छात्राओं को पढ़ने-लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। भेद-भाव रहित नारी शिक्षा की जोरदार वकालत उन्होंने की तथा  स्त्रीयों  की शिक्षा को पुरूषों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण भी बतलाया। स्त्री शिक्षा के संबंध में महामना के व्यापक एवं उदार विचार निश्चय ही आज की परिसिथतियों के लिए भी अनुकरणीय है।

3  नैतिक शिक्षा एवं चरित्र निर्माण - महामना शिक्षा के द्वारा मनुष्य का चरित्रिक उन्नयन करना चाहते थे। इसके लिए नैतिक शिक्षा के हिमायती थे। आचरण एवं विचारोंकी शुद्धता इनका तालमेल एवं गुणवत्ता पर महामना सदैव ही ध्यान दिया करते थे। वर्तमान शिक्षा पद्धति इस संदर्भ में महामना के विचारोंसे बहुत कुछ ग्रहण कर सकती है। क्यों कि यह आज के समय की महत्ती आवश्यकता भी है। समाज में सर्वत्र भ्रष्टाचार एवं बेर्इमानी का माहौल है। लोगो में नैतिक पतन बहुत अधिक हो रहा है। नैतिक शिक्षा में महामना के विचारोंको समिमलित करने से चरित्र निर्माण में मदद मिल सकती है।

4  राष्ट्रीयता का विकास - महामना ने जीवन भर राष्ट्रीयता की भावना के उत्थान हेतु कार्य किया। वे राष्ट्रीय एकता एवं साम्प्रदायिक सौहाद्र्र के बड़े पोषक थे। साम्प्रदायिक संकीर्णताओं को राष्ट्र की प्रगति में सर्वाधिक बडा बाधक मानते थे। वर्तमान पाठयक्रम में भी राष्ट्रीय एकता, अखड़ता एवं साम्प्रदायिक सौहाद्र्र को प्रोत्साहित किये जाने वाले पाठों को शामिल किया जाना चाहिए। इस दिशा में प्रयास भी वर्तमान समय में किए जा रहे है जो कि सराहनीय हैं।

5   व्यावसायिक शिक्षा संबंधी विचार - महामना शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य केा आत्मनिर्भर बनाना मानते थे इस उद्देश्य से वेछात्रों  को व्यावसायिक  कौशलों  से भी सुशोभित करना चाहते थे। हालाँकि इस मुददे पर उनके विचार गाँधी से भिन्न थे। महामना के व्यावसायिक शिक्षा संबंघी विचार आज की युग की बड़ी समस्या का समाधान प्रस्तुत करते है। शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाने एवं व्यावसायिक शिक्षा के प्रस्फुटन के लिए प्रयास आज की शिक्षा-नीति में भी किए  जा रहे है।

6  मानवीय मूल्यों के विकास हेतु शिक्षा - महामना शिक्षा को मानवीय मूल्यों के विकास हेतु अत्यंत आवश्यक मानते थे। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म के अनुरूप, समाज के अनुरूप एवं मर्यादा युक्त आचरण के लिए सदैव प्रेरित करना शिक्षा का दायित्व मानते थे। सत्य, अहिंसा, त्याग, करूणा, अस्तेय, अपरिग्रह, शौच आदि सदगुणों को पाठयक्रम के माध्यम से प्रोत्साहन देना चाहते थे।

महामना का शिक्षा के द्वारा मानवीय मूल्यों के प्रसार के विचार    आज नि:संदेह अत्यंत ही प्रासंगिक हो चले है क्योंकि यही मूल्य मनुष्य को मनुष्य बनाये रखते हैं। सभ्यताएँ चाहे कितनी भी विकसित क्यों न हो जाएँ, प्रेम, सत्य, अहिंसा, परोपकार, सहयोग, करूणा, सहिष्णुता आदि सदगुणों की उपयोगिता एवं आवश्यकता प्रत्येक समय में है।

7. स्वास्थ्य शिक्षा एवं शारीरिक शिक्षा - महामनाविधार्थियों के उच्च कोटि के शारीरिक विकास एवं स्वास्थ्य को शिक्षा के माध्यम से प्रेरित करना चाहते थे। इस हेतु व्यायाम, शारीरिक परिश्रम, खेल-कूद एवं योग पर सदैव जोर देते थे।

वर्तमान शैक्षिक पाठयक्रम भी तभी सार्थक हो सकता है जब वह हमें सबल एवं निर्भीक बनने में हमारी सहायता करे। इस हेतु शिक्षा के द्वारा संतुलित खान-पान, योग तथा शारीरिक श्रम एवं कसरत के प्रोत्साहन से उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने पर बल देना चाहिए।

8. छात्र एवं शिक्षकों के गुणों संबंध में अनुकरणीय विचार - महामना की छात्र एवं शिक्षकों के संबंध में संकल्पनाएँ आज भी अनुकरणीय है। छात्र का आचरण एवं उसका धर्म आज की युवा पीढ़ी को दिग्भ्रमित होने से बचा सकता है। साथ ही शिक्षकों से की गर्इ अपेक्षाएँ उन्हें अपने कार्यक्षेत्र में सफलता एवं लोकप्रियता के उच्चतम शिखर पर पहुँचा सकती है। छात्र एवं शिक्षक के मध्य पिता-पुत्र का संबंध यधपि वर्तमान परिदृश्य से गायब अवश्य हो रहा है तथापि इसकी आज की शिक्षा-प्रणाली को आवश्यकता है।

9.शिक्षा द्वारा वैज्ञानिक सोच एवं दृष्टि  को प्रोत्साहित करना आज के समाज की आवश्यकता - महामना विज्ञान की शिक्षा एवं वैज्ञानिक दृष्टि कोण के बहुत बड़े समर्थक थे इसे राष्ट्र की उन्नति के लिए आवश्यक भी मानते थे। वर्तमान शिक्षा पद्धति का भी मुख्य फोकस वैज्ञानिक सोच एवं दृष्टि कोण को प्रोत्साहित करना ही है। इस संबंध में महामना के विचारोंएवं वर्तमान शैक्षिक परिसिथतियों की आवश्यकताओं में पर्याप्त समानता है जिससे इनका समाधान किया जा सकता है।

10 लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा संबंधी विचार -  महामना लोकतांत्रिक मूल्यों में गहरी आस्था रखते थे। शिक्षा के द्वारा स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुत्व का प्रचार-प्रसार आवश्यक समझते थे। वर्तमान समय में यधपि भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है परन्तु नेता से लेकर जनता तक लोकतांत्रिक मूल्यों से हीन होते जा रहे है। ऐसे समय में महामना के लोकतांत्रिक मूल्यों सम्बनिधत विचारोंको शैक्षिक पाठयक्रम में स्थान देकरविधार्थियों में लोकतंत्र के प्रति आस्था का भाव उत्पन्न किया जा सकता है।

11 संपूर्ण व्यक्तित्व निर्माण के लिए शिक्षा - समय चाहे कोर्इ भी हो शिक्षा समग्र रूप में समाज में यही भूमिका निभाती हैं। महामना ने भी शिक्षा के द्वारा संपूर्ण व्यतित्व के निर्माण एवं विकास की बात कही है।

आज भी समग्र रूप में शिक्षा की यही प्रासंगिकता है। यह तभी सार्थक है जब व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास शिक्षा के द्वारा हो सके। वास्तव में महामना का शैक्षिक दर्शन इतना व्यापक, मौलिक, व्यावहारिक एवं उपयोगी है कि प्रत्येक काल में अनुकरणीय है। महामना के काल की शैक्षिक परिसिथतियों एवं वर्तमान शैक्षिक परिसिथतियों में पर्याप्त साम्य होने के कारण इनके विचारोंकी प्रासंगिकता काफी बढ़ जाती है।

मालवीय जी ने शिक्षा को लेकर अपनी जो धारणा बनार्इ उसमें तत्कालीन परिसिथतियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। औपनिवेशिक भारत से धन की व्यापक लूट, नागरिकाें की दीन दशा, सनातन संस्कृति एवं हिन्दू धर्म के समक्ष उत्पन्न संकट, भारतीय साहित्य एवं भाषा से मोहभंग की सिथति, सर्वत्र व्याप्त निराशावाद, समाज में व्याप्त अंधविश्वास कुरीतियाँ एवं बुरार्इयाँ आदि महत्वपूर्ण प्रेरक परिसिथतियाँ थीं जिसने उनके शैक्षिक चिंतन के विकास में अहम योगदान दिया। इन परिसिथतियों ने महान देशभक्त धर्मानुरागी मालवीय को बैचेन कर दिया। उन्होंने संघर्ष करने का संकल्प किया। इन समस्याओं से अपने जीवन के अंतिम दिनों तक संघर्ष करते रहे। महामना ने शिक्षा के द्वारा चेतना की अलख जगाने का जो प्रयास काशी हिन्दू विश्वविधालय की स्थापना कर किया इसके लिए राष्ट्र सदैव उनका ऋणी रहेगा। इसके अतिरिक्त अनेक महान कार्य जो उनके द्वारा किये गए। उनके प्रत्येक कार्य से मानवता की सेवा, विशुद्ध राष्ट्र-प्रेम विशाल, âदयता एवं उदारता की सहज भावना परिलक्षित हेाती है। राष्ट्रहित के लिए सर्वस्व समर्पित करने की यह नि:स्वार्थ आतुरता अन्यत्र नहींं मिलती।

लार्ड मैकाले की कुटिल शिक्षा-नीति के हाथों दम तोड़ती प्राच्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था एवं प्राचीन भारतीय संस्कृति की जिस प्रकार से रक्षा महामना ने की वैसे ही महान प्रयत्नों के द्वारा वर्तमान शैक्षिक समस्याओं का समाधान सभंव है। शिक्षा सामाजिक सरोकारों एवं संस्कारों के विकास के दायित्व से कभी मुक्त नहींं हो सकती है। भारतीय सन्दर्भ में महामना की विशेष प्रांसगिकता को महत्वपूर्ण कसौटियों पर देखा जा सकता है, जो वर्तमान भारतीय शिक्षा के लिए उपयोगी है।

महामना के शैक्षिक विचारोंको कुछ नवीन परिवर्तनों के उचित समायोजन के साथ वर्तमान परिसिथतियों में महामना के शैक्षिक विचारोंको सहजता से अपनाया जा सकता है। ये आज भी बहुत प्रासंगिक है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

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