ISSN-2231 0495

Volume 1 || Issue 1 - Jan. 2011

Coping with Examination Anxiety and Stress

 

 

Coping with Examination Anxiety and Stress

Dr. Suman Dalal
Reader,
BPSMV,
Khanpur Kalan

Abstract

As March-April-May come, everybody gets worked up, especially parents, teachers, and students. Who amongst them are most affected is hard to say, because it differs, based on the mental makeup of each of them. This is the season of advice, which students get unsolicited from all corners. Caught in the vortex of the collective frenzy, any student will be at the end of his tie. This paper suggests the ways and means which are helpful for students to overcome this exam-phobia and face it calmly and confidently, and come out not just unscathed, but really victorious?

Key Words: Examination, Anxiety and Stress

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A Study of the Attitudes of In-Service Teacher Persuing IGNOU B.Ed. towards Teaching Profession

A Study of the Attitudes of In-Service Teacher Persuing IGNOU B.Ed. towards Teaching Profession

Dr. Rajnish Pandey
Reader, Department of Education
MIT,Dhalwala

 

Abstract

The purpose of this study is to determine the attitudes of In-Service teacher’s persuing IGNOU B.Ed. towards teaching profession and teaching competency. The population and sample of the study were the students of IGNOU B.Ed. Two-year Programme. The study was conducted on 200 In-Service Teacher from different corners of the state of Uttarakhand. A survey was conducted in order to measure the attitudes of teacher candidates towards teaching profession. The study revealed that the attitudes of teacher candidates towards teaching profession are quite positive. Moreover, the teacher candidates consider the program as beneficial to them to improve their academic excellence and teaching competencies with positive attitudes.

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माध्यमिक स्तर के अध्यापकों एवं अध्यापिकाओं के अध्यापन के प्रति अभिवृति

माध्यमिक स्तर के अध्यापकों एवं अध्यापिकाओं के अध्यापन के प्रति अभिवृति
विनोद कुमार
प्रवक्ता, शिक्षक-प्रशिक्षण विभाग
श्री बलदेव सिंह महा0वि0 हलियापुर
सुलतानपुर
डा0 बी0 के0 साहू
प्रवक्ता, शिक्षक प्रशिक्षण विभाग,
डा0 हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय सागर म0प्र0

 

 

शिक्षा ही जीवन और जीवन ही शिक्षा है। महान अमेरिकन शिक्षा शास्त्री डी0वी0 महोदय का कथन अक्षरशः सत्य है। बालक मां के गर्भ से लेकर जीवन की अन्तिम श्वांस तक कुछ न कुछ शिक्षा लेता रहता है। पर्यावरण की हर वस्तु उसे कुछ न कुछ सीख देती है। विज्ञान का यह चमत्कारी उत्कर्ष भी प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षण से ही हुआ है और साथ ही साथ मानव सभ्यता के विकास की आधारशिला शिक्षा ही है।
बालक सर्वप्रथम अपनी मां से शिक्षा प्राप्त करता है क्योंकि मां ही उस समय ही उसके सबसे सन्निकट होती है। इसीलिए तमाम मनावैज्ञानिकों ने मां को प्रथम शिक्षक कहा है। उसके परिवार के पर्यावरण से बालक में मानवोचित व्यवहार का वीजारोपण होता है और आगे चल कर समाज द्वारा उसे पोषण प्राप्त होता है।
महान शिक्षाशास्त्री पेस्टालाजी का कहना है कि शिक्षा  हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। कुछ लोग शिक्षा को विलासिता समझते है अथवा समाज द्वारा बच्चे पर एक प्रकार की कृपा समझते हैं। इस बात का विरोध करते हुए पेस्टालाजी महोदय ने कहा है श्शिक्षा व्यक्ति की अनिवार्य आवश्कता है और उसकी आवश्यकता की पूर्ति का दायित्व समाज को उठाना ही चाहिए। शिा की समूचित व्यस्था करके समाज अपने दायित्व को ही निभाता है वह बालक पर किसी प्रकार की दया नहीं करता।राष्ट्रीय शिक्षा आयोग न टिप्पणी की है भारत के भविष्य का निर्माण अब उसके शिक्षण कक्षों में होना है। विज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान पर अवलम्बित आज के विश्व में यह शिक्षा ही है जो मानव की समृद्धि, सुरक्षा एवं हित को निर्धारित करती हैं।

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