ISSN-2231 0495

Volume 1 || Issue 2

आत्मनिष्ठ युग में अतिमानसिकीय योग एवं योग समन्वय पद्वति का अध्ययन

आत्मनिष्ठ युग में अतिमानसिकीय योग एवं योग समन्वय पद्वति का अध्ययन

जयप्रकाश कसंवाल
प्रवक्ता
राजकीय स्नातकोत्तर स्वायत्तशासी महाविधालय
ऋषिकेश, देहरादून
डा0 ईष्वर भारद्वारज, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष,
मानव चेतना एवं योग विज्ञान विभाग
गुरूकुल कांगड़ी,विश्वविद्यालय, हरिद्वा

 

 

 

मानव शरीर एक शरीर न होकर शिवालय है जिसका जीवन साधनाओं की एक प्रयोगशाला है। सांसारिक तथा आध्यात्मिक जिज्ञासू सदैव नये अथवा पौराणिक प्रयोगों, संस्कारों अथवा विचारों पर कार्य करता हुआ अपने जीवन के उद्देश्यों की पूर्ती करता रहता है। जीवन उद्देश्य चाहे वह सांसारिक हो अथवा आध्यात्मिक दोनों में हीशरीरही सर्वप्रथम आवशयकता है जिसे श्री अरविंद ने अनिवार्य माना है। इस शरीरके कर्म, साधना एवं अभ्यास से वह सफलता प्राप्त करता है। नये अनुसंधानों अथवा पौराणिक अभ्यास क्रमों में सदिग्धा अवस्था के लिए श्री अरविंद जी की अतिमानसीयोग पद्वति सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद जी योग समन्वय पद्वति साधकों की अभिरूचि के अनुरूप कर्मयोग, भक्ति, राजयोग आदि का मार्ग प्रशस्त करती है।

भारतीय दर्शनों में योग शब्द को दो अर्थों में प्रस्तुत किया गया है। एक योग का अर्थ मिलना या जुड़ना है तथा दूसरे योग का अर्थ समाधि अर्थात् ईश्वर साक्षात्कार है। वास्तव में योग के ये दोनों ही अर्थ दो सत्ताओं के द्योतक हैं परन्तु श्री अरविन्द के अनुसार जब सब कुछ सच्चिदानन्द की अपनी ही अभिव्यक्ति है तब यहाँ योग से दो सत्ताओं का मेल मात्र से नही निकाला जाना चाहिए अपितु श्री अरविन्द ने योग का अर्थ करते हुए लिखा है कि, “सत्ता में गुप्त शक्तियों की अभिव्यक्ति द्वारा आत्म पूर्णता की ओर एक व्यवस्थित प्रयत्न और व्यक्ति का उस सार्वभौम और अतिशायी सत्ता से संयोग है जिसको कि हम मानव और जगत् में अंश रूप से व्यवस्थित देखते हैं।“ इस प्रकार श्री अरविन्द योग को आध्यात्मिक योग और अतिमानसिकीय योग कहते हैं। श्री अरविन्द ने अपने पूर्ण योग के माध्यम से वैयक्तिक विकास का भी महत्वपूर्ण वर्णन किया है। उनका विकास का सिद्धान्त ऐसा है जिसके द्वारा वैयक्तिक और सार्वभौमिक प्रकृति के प्रयोजन को समझा जा सकता है, क्योंकि उनके अनुसार जड़ पदार्थ आत्मा की अभिव्यक्ति है जिसका उद्देश्य शुद्ध आनन्द है और जब उसका उद्देश्य पूर्ण हो जायेगा तब उसका अपनी आन्तरिक उपादेयता के कारण अपने प्रारम्भिक रूप में पुनः लौट आना चाहिये। श्री अरविन्द के अनुसार व्यक्ति का विकास निश्चेतना के द्वारा अधिक अज्ञान की ओर विकास नहीं है वरन् यह ज्ञान से अतिचेतना के और अधिक ज्ञान की ओर विकास है। यह विकास की प्रक्रिया निष्प्रयोजन नहीं है बल्कि सप्रयोजन है। इस सम्बन्ध में श्री अरविन्द कहते हैं कि ”एक उच्चतर और आध्यात्मिक सृष्टि के रूप में समस्त जगत् के जड़ जगत में स्वयं अभिव्यक्त हो जाने तक सत्ता की उच्चतर शक्तियों की अभिव्यक्ति विकास में प्रयोजन के रूप में मानी जा सकती है। सृष्टि के अन्दर निरन्तर बढ़ने वाली गहनता, गहराई और विस्तार को देखकर यह स्वतः जाना जा सकता है कि विकास क्रम निरन्तर आगे बढ़ रहा है, किन्तु यह सम्पूर्ण विकास एक साथ हो जायेगा ऐसा नहीं है वरन् उनका कहना है कि जब मानव मस्तिष्क एक विशेष अवस्था में पहुँच जायेगा तब उसका विकास स्वतः दिव्य या उच्चतर स्तर की ओर हो जायेगा तथा मस्तिष्क की विशेष अवस्था तब आयेगी जबकि उसका मानसिक, प्राणात्मक तथा भौतिक स्तरों का रूपान्तरण हो जायेगा।

श्री अरविन्द की योग-साधना का उद्देश्य भी यह है कि सीमित और बहिर्मुख अहं को बहिष्कृत कर दें और उसके स्थान पर ईश्वर को प्रकृति के नियन्ता अन्तर्यामी के रूप में स्थापित करें। इसके लिए आवश्यक है कि पहले कामना का नियन्त्रण करें तथा उसे उसके अधिकार से हटायें। आध्यात्मिक जीवन अपना पोषण कामना से नहीं, बल्कि मूल सत्ता के विशुद्ध और अहंकार रहित आध्यात्मिक आनन्द से प्राप्त करेगा। इस प्रक्रिया के लिए श्री अरविन्द का सर्वांग योग साधक के लिए एक सफल मार्ग प्रस्तुत करता है क्योंकि उन्होंने योग के लिए जीवन को त्याज्य नहीं माना है बल्कि उन्होंने जड़सत्ता को भी महत्वपूर्ण साधन माना है उन्होंने दिव्य सत्ता को ही अपनी जड़ सत्ता में उतार लाने का मार्ग प्रस्तुत किया है जिससे साधक शरीर को बाधा नहीं बल्कि साधन रूप में प्रयोग करे, इसीलिए श्री अरविन्द का सर्वांग योग अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

स्वामी विवेकानन्द की योग पद्वति योग समन्वय कहलाता है। यह पूर्ण वेदांतवादी है। स्वामी जी का वेदों के प्रति अनुराग ने ही उनके मिशन को अत्यन्त हठता एवं ऊँचाई प्रदान की है। वेदांतवादी के होने के कारण इनका लक्ष्य एवं उद्देश्य स्पष्ट है। लक्ष्य अर्थात् योग के साधना द्वारा ईश्वर प्राप्ति। मोक्ष की साधना स्वामी जी का व्यावहारिक पहलू रहा है। अतः इन्हांेने योग के लक्ष्य के लिए चार आधारभूत स्तम्भों को अपनाया है। वे आधारभूत स्तम्भ है-(1) ज्ञानयोग, (2) कर्मयोग, (3) भक्तियोग, (4) एवं राजयोग, और इन स्तम्भों के आधार पर इन्होंने न केवल स्वयं का बल्कि भारत का मिशन भी तय किया है। इन चारों स्तम्भ में प्रमुख आधारभूत स्तम्भ वेदान्त है, अतः योगसमन्वय के आधार प्रथम नींव वेदान्त को स्वामी जी के अनुसार प्राथमिकता है।

कर्मयोग योग समन्वय का प्रथव आधारीय स्तम्भ है। कर्म शब्द ’कृ’ धातु से निकलता है जिसका अर्थ है “क्रिया करना” इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ कर्मफल भी होता है। स्वामी विवेकानन्द ’कर्म’ शब्द का अर्थ केवल कार्य से ही स्वीकार करते हैं जबकि दार्षनिक दृष्टिकेाण से यह वे फल भी हो सकते हैं जिनके कारण कि हमारे पूर्ण कर्म रहते हैं। कर्म के तीन भेद क्रियमान, संचित् एवं प्रारब्ध बताते हुए इन्ही कर्मों के आधार जीवन का लक्ष्य का निर्धारण तथा साधना रूप में अपनाकर किया जा सकता है। विवेकानन्द जी कहते हैं दूसरों की शारीरिकआवशयकताओं की पूर्ति करके उनकी सहायता करना महान कर्म अवष्य है किन्तु अभाव की मात्रा जितनी अधिक रहती है उतना ही उच्चतर उपकार की प्राप्ति होती है। कर्मयोग के तत्व को समझने के लिएआवशयक ’कर्तव्य’ को जाननाआवशयक है। प्रत्येक कार्य चाहे वह व्यावहारिक जीवन में हो अथवा आध्यात्मिक जीवन में कर्म आवशयक है बल्कि साधक का कर्तव्य है कर्तव्य के बिना कर्मयोग की आधारशिला रखने का अभ्यास न करे। अतः ईश्वर की प्राप्ति को अपना कर्तव्य समझकर कर्मयोग का अनुसरण करना साधक को श्रेष्ठ उपलब्धि की ओर लेकर जाता है।

स्वामीजी के योग समन्वय का दूसरा आधारभूत स्तम्भ राजयोग है, राजयोग विभिन्न यौगिक साधनों में सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है। वास्तव में राजयोग उत्कृष्ट विद्या है जो कि मन का विज्ञान है, मन से उत्तम साधक राजयोग को सहजता से अपना सकता है। इसे मन का विज्ञान इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि मनुष्य का सकल ज्ञान उसके अनुभव पर आधारित होता हैं और अनुभव के प्रामाणिक होने पर इसे निश्चित विज्ञान कह सकते हैं। इसलिए योग के पूर्व आचार्य स्वीकार करते हैं कि धर्म पूर्वकालीन अनुभवों पर स्थापित ही नहीं वरन् इन अनुभवों से स्वयं सम्यक् हुए बिना कोई भी धार्मिक नही हो सकता है और जिस विद्या के अन्तर्गत यह अनुभव होता है उसे ही राजयोग कहते हैं। और राजयोग सत्य का साक्षात्कार करवाता है और सत्य की धारणा विकसित होने पर हृदय के अन्तरिम प्रदेश में वह सिद्ध हो जाता है उसके समस्त संदेह दूर हो जाते हैं और सारा तमोजाल छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो जाता है और सारी वक्रता सीधी हो जाती है। अर्थात् साधक के साधना मार्ग के सभी अवरोध दूर हो जाते हैं।

विवेकानन्द के योग समन्वय  कर्मयोग तीसरे क्रम में आता है। गीता में कहा है कि प्राणी बिना कर्म किये क्षण भर जीवित नहीं रह सकता है। अर्थात् प्रत्येक प्राणी को कर्म करते रहना चाहिए। किन्तु विवेकानन्द के अनुसार कर्मयोग का प्रथम तथा आधारभूत प्रश्न है कि कर्म क्या है ? और संसार के प्रति उपकार करने का क्या अर्थ है ? “वास्तविकता मे संसार यदि ऐसा होता तो संसार भौतिक दुःखों, प्रलोभनों से बाहर निकल अपने निज स्वरूप में स्थिर हो जाता है“। निज स्वरूप अर्थात् मूलरूप में जहां पर साधक स्वयं स्वस्थ तथा चित्त की स्थिरता वाला होता है। ”इसी नियम को योगदर्शन भी स्वीकार करता है। चित्त की निवृत्ति हो जाने पर साधक अपने शुद्ध एवं चैतन्य स्वरूप में स्थापित होता है और इस स्वरूप में स्थिरता के लिए ही उसने अष्टांग पथ को अपनाया है। सांसारिक सुख एवं दुःख को न तो बढ़ाया जा सकता है और न ही घटाया जा सकता है। वास्तविकता में यह संसार के दो पहलू मात्र है। जिन्हें केवल अदला-बदला या धकेला जा सकता है। परन्तु यह सार्वभौम सत्य है यह निश्चित है और रहेगा क्योंकि ऐसा रहना इसका स्वभाव है। मनुष्य सदैव दो पहलुओं के साथ जीवन यापन करता है जैसे- दिन-रात, सूर्य-चन्द्रमा, माता-पिता तथा सकारात्मक भाव आदि बिन्दु ऐसे हैं जिसमें किसी एक का ही अस्तित्व रहे सम्भव नहीं है। ज्वार-भाटा, यह उतार-चढ़ाव तो संसार की प्रवृत्ति है।

भक्तियोग योग समन्वय पद्वति का चतुर्थ स्तम्भ है। भारतीय दर्शनों में ईश्वर जीवन का लक्ष्य माना जाता है क्योंकि वही एक सार्वभौमिक और सर्वश्रेष्ठ सत्ता है। ईश्वर से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है और इसलिए इन्द्रियों को अन्तर्मुखी करके ईश्वर के सच्चे स्वरूप को पाया जा सकता है जिसका एक उपाय भक्तियोग भी कह सकते हैं। मनुष्य भले ही संसार के समस्त ग्रन्थों को पढ़ लो किन्तु यह प्रेम न तो वाग्मिता द्वारा, न तीव्र बुद्धि से और न शास्त्रों के अभ्यास से ही प्राप्त किया जा सकता है जिसे ईश्वर की चाह है उसी को भक्ति प्राप्त होती है और वह भी ईश्वर ही उसे प्रदान करता है। अतः भक्ति के प्रति सच्ची श्रद्धा भावना और समर्पण की आवश्यकता होती है इसलिए यह सहज भी है और उतनी ही कठिन भी, सहज इसलिए कि इसके लिए किसी उच्च ज्ञान की आवश्यकता नहीं, कठिन इसलिए कि समर्पण और श्रद्धा की भावना इसके लिए आवश्यक चाहिए जो स्वयं में नितान्त आवश्यक है और यह सहज नहीं है। इस भक्तियोग कि साधना हेतु भक्ति साधक को गुरु या आचार्य की आवश्यकता अवश्य रहती हैै। जिससे उसकी साधना सफल हो, ईश्वर के दर्शन कर सके। जिस आत्मा से उसे यह शक्ति मिलती है उसे गुरू या आचार्य कहते हैं और जिस आत्मा को यह शक्ति प्रदान की जाती है वही शिष्य या चेला कहलाता है। किन्तु इन दोनों का स्तर इस प्रकार होना चाहिए कि दोनों ही ज्ञान शक्ति को देने तथा लेने में समर्थ हो अन्यथा भक्ति कमजोर पड़ सकती है। किन्तु साधना की सफलता के पश्चात् सांसारिक लोभ, भौतिक साधना नीरव तथा तथ्यहीन विषय है। भक्ति मार्ग तो ऐसी साधना है जब भी आवश्यकता होगी तो सच्ची श्रद्धा और समर्पण की भावना होने पर ईश्वर स्वयं भक्त को बचा कर उसके कष्टों को हर लेते हैं। गीता में कहा है ”जब जब धर्म का ह्रास होता है और अधर्म की वृद्धि होती है तब मैं आकर स्वयं मानव जाति का उद्धार करता हूँ अज्ञानी लोग यह न जानकर कि सृष्टि के सर्वशक्तिमान् और सर्वव्यापी ईश्वर ने यह मानवरूप धारण किया है, अवहेलना करते हैं और सोचते हैं कि यह सम्भव नहीं है। अतः भक्त के प्रति तो स्वयं भगवान् की आसक्ति होती है कि उसके भक्त को कोई कष्ट न हो इसलिए भक्त को बिना संशय के पूर्ण श्रद्धा तथा समर्पण की भावना के साथ ईश्वर भक्ति में लीन रहना चाहिए जो योग समन्वय का चतुर्थ आधार है।

सन्दर्भ ग्रन्थ

1.योग प्रणाली, स्वामी कृष्णानंद, प्रकाशन- दिव्य जीवन संघ, शिवानंद नगर, टि0ग0, उत्तराखण्ड।

2.योग सिद्धांत एवं साधना, पं0 दातार हरिकृष्ण शास्त्री, प्रकाशन- चैखम्भ विघाभवन, वाराणसी।

3.राजयोग, स्वामी विवेकानंद, अनुवादक प्रो0 सुशील कुमार चन्द।

4.कर्मयोग, स्वामी विवेकानंद, अनुवादक नाथ एवं मजूमदार।

5.भक्तियोग, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण मठ, कलकत्ता।

6.ज्ञानयोग, स्वामी विवेकानन्दं, रामकृष्ण मठ, कलकत्ता।

7.योगदर्षन, स्वामी निरंजना नन्द सरस्वती, प्रकाशक- मुगेंर टस्ट, विहार।

8.दिव्यशरीरमें दिव्य जीव, नवजात प्रकाशक, प्रकाशक- श्री अरविंद सोसायटी, पाण्डीचेरी।

9.योग समन्वय, श्री अरविन्द, प्रकाशक- श्री अरविंद सोसायटी, पाण्डीचेरी।

10.दिव्य जीवन, श्री अरविंद सोसायटी, पाण्डीचेरी।

 

Education for Development of Personality

Education for Development of Personality

Dr. Suman Dalal
Reader,
BPSMV,
Khanpur Kalan

Introduction

Liberalization, globalization and privatization have brought in their wake intense competition. Education plays an important role in enabling a person to face a real life situation with adequate knowledge.

All-round betterment will enable us to be prepared and equipped in this fast-paced life to undertake a work efficiently and effectively leading to accomplishment of the objective with remarkable ease. By rejuvenating themselves at physical, mental and spiritual levels simultaneously, people can enrich their individual lives and also bring about lasting change in their attitudes, whether in the workplace or in the family setup. Happiness and success are complementary and supplementary to each other.

For achieving success in any mission, proper education, knowledge in that particular field, and management are essential pre-requisites but the factor that contributes largely to success is overall development of the personality and getting the best out of a team. Being physically fit, mentally alert and spiritually active will result in overall development of the personality. Managing people is a significant factor that contributes to the overall performance of the team.

An attempt has been made to present here several thoughts that would help in overall development and maximizing the performance.

Education

Education plays a pivotal role in shaping a person. The dual requirement of bringing up an individual as a worthy citizen of a country with diverse cultures and traditions on the one hand and achieving the uniform standard of excellence for any particular profession on the other is an important criterion. Education should not become a product of persuasion. Education should be motive force due to which a man will pursue knowledge relentlessly whatever may be his field of enquiry.

In this connection, the following enlightening words will guide us in our pursuits:

  • Real education requires cultivation of sense of humility. Great learning brings great humility. Without humility, there is no education.
  • Education bereft of values is meaningless.
  • Politics without principles, science without humanity, education without character and commerce without morality are not only useless but can prove to be dangerous and harm people at large.

A balanced education should give total opportunity to the learner to discover and use his fullest potential. While aiming at total growth, it should cater to the following:

  • Development of skill, proper habits, attitudes and human values.
  • Application of knowledge as and when required with right does.

It is not just inborn talent or educational achievements that guarantee the success of children. Without sound values, good habits and strict self-discipline, even the most gifted child cannot blossom into a good achiever. Without getting them inculcated with proper values, more academic achievement would amount of accumulation of degrees/ diplomas which will be a cold comfort on a wintry night.

The extraordinary success of a human being depends on one’s inborn qualities and personal traits-instinct, intuition, creativity and flexibility. Fortunately, we have in India an education policy and system that channelizes this unusual talent in the right direction. The practice of inculcating in children sound values and good moral right form the stage of primary education through stories, biographies etc has stood the test of time. It because of this that Indians going abroad are able to make a mark.

The blend of our Sanskar-heritage, culture and value system-with the modern and advanced technologies from the West can create a human resource that would be unparalleled.

Modern business has lot to gain form the Indian ethos. Our age-old concepts of Dharma or righteousness, Artha or wealth creation, Kama or enjoying the wealth thus created and Moksha or achieving perfection have never been more relevant business principles that today. Unfortunately, however, today’s manager concentrate more an creating wealth and enjoying it rather than focusing on Dharma and Moksha which are the most important ingredients for success. Only the educated are free in mind and body. People who do not recognize a palpable absurdity are very much in the way of civilization. Natural abilities are like natural plants that need pruning by study. Intelligence is quickness to apprehend, as distirict form ability, which is the capacity to act wisely on the thing apprehended.

Knowledge, Skills, Attitude Wisdom (value-based education will stand anyone in good stead. Developing a band of learning individuals, armed with strong conceptual foundations and intuitive insights and capable of successfully meeting the challenges of a global business economy is the need of the hour.

Through education, one gains knowledge and broadens his/her horizon. Learning is a continuous process. The fruits of knowledge go beyond you alone; they touch all those around you. And it’s never too late to reach for them. It is good to remember that   “Knowledge without integrity is wickedness. Knowledge with integrity is pure wisdom.”

We should aim to raise the standard of education in the country to a level where there is no limit for knowledge. We should also aim at inculcating values of self-sacrifice, endurance, determination, physical and mental courage, co-operation and tolerance amongst students. In this context, tow Slakes come to mind whose English translation is given below:

  • Education bestows humility, humility leads to good conduct, good conduct enables earning money, and money enables practicing Dharma leading to Happiness.
  • Student learns one part from his teacher (guru), another part by himself (i.e. by his own efforts), third part by SATSANG (association with good people), and the fourth and final part through experience as time passes.

The following words of Aristotle emphasize the importance of education:

  • The roots of education are bitter, but the fruit is sweet.
  • Educated men are superior to the uneducated as much as the living are to the dead.

Following points one should follow for effective development of personality:

Value System – Evaluation

  • Constant evaluation, course correction and stock taking are signs of maturity and are likely to prove beneficial in every sphere of one’s life- be it personal, social or professional. All human beings are unique in their own sense and have been endowed with a mixed bag of qualities. Some of these qualities help build up one’s personality and are, therefore, called as strong points. Curiosity, hard work, perseverance, determination, adaptability, honesty, humility, sensitivity, responsible attitude and an open mind are some of the time-tested strong points.
  • But a strong point of personality is of no use till it is actually put to some use. So, one should realize his/her aspirations and, besides trying to highlight the positive points, should seriously and gradually eliminate those which are not strong.
  • One should assess one self honestly. Let his success and satisfaction be his guide.

Prayer

Prayer is essential for everyone, whatever may be your religion. It purifies the mind, removes fear and anxiety, causes enlightenment and leads to all –round enthusiasm and happiness.

Walking

Walking regularly morning and evening for half an hour each time.

Reading

Reading good books is a good habit. Besides increasing knowledge, it gives strength to face difficult situations. It would be appropriate to quote here the words of Francis Bacon:“Reading maketh a full man, conference a ready man and writing an exact man.”

Hobby

One should have an absorbing hobby like music, reading, writing and painting. They remove monotony and rejuvenate a person.

Manner, Small Courtesies, Etiquette, Praise

Good manners make the work pleasant. Small things and events shape our attitudes to the big events and crises in our lives. The touch of personal interest and closeness that we show in the various transactions form morning till night transform our lives. It is the small acts of courtesy and graciousness, of gratitude and of humility that shape our lives.

Praise is a basic human need without it, none of us gives of our best. With it, we give off our best willingly. It is always good manners to give praise where it is due. Praise every improvement it people. Praise even if there it slight improvement.

Dealing with Stress

Get good exercise, adequate sleep, and regular, balanced meals. Pray regularly and read religious books. They give mental peace and strength to face different situations.

Anger

One should control anger as it can lead to undesirable consequences. In this context, the words of Aristotle come to mind,“Any one can get angry – that is easy. But to be angry with the right person, to the right degree, at the right time, for the right purpose, and in the right way-that is not easy." The effect of anger is best illustrated in Bhagavat Gita as could be seen from the translation given below:

“From anger comes delusion;

From delusion loss of memory;

From loss memory the destruction of discrimination;

Form destruction of discrimination one perishes.

Friendship

A friend is one who comes close to us when the whole world goes far to us when the whole world goes far away from us. He is an invaluable asset at all times and under all circumstances.

“Friendship is very much like good health. You do not know what you have until you lose it.”

Character: The Vital Ingredient for True Success

Character is made up of those principles and values that give your life direction, meaning and depth. These constitute your inner sense of what is right and wrong based not on laws or rules of conduct but on who you are. They include such traits as integrity, honesty, courage; fairness and generosity- which arise form the hard choices we have to make in life. So wrong is simply in sing wrong, not in getting caught. We can begin to build character at any age and without it, we will never truly succeed. The importance of character is best illustrated in the saying: “When wealth is lost, nothing is lost. When health is lost, something is lost, When character is lost, everything is lost.”

Act as Scriptures suggest

  • “Thy righty is to work only, but never to its fruits; let not the fruit of action be thy attachment be to inaction.”
  • “Devoted each to his own duty, man attains perfection.”
  • “Attachment to the good leads to detachment; detachment from bad leads to desire-free environment; desirelessness leads to steady state of mind; steadiness leads to the salvation from the world around”.

Some Visionaries

We should practice what our leaders have fought for :

Mahatma Gandhi-Truth, nonviolence; the Lord resides in hearts of all beings.

Swami Vivekananda – Tolerance, accept all religions as true.

Dalai Lama –Compassion, nonviolence, gentleness, affection.

Sri Aurobindo-Strive for freedom from ignorance.

Requisites for Success

We should train our mind and cultivate initiative, enthusiasm, self-confidence, perseverance and discipline.

“Life is not just what it is, but life is what you make out of it.”

Success is skill-based. Along with developing academic acumen, you need to develop emotional intelligence and social skills too. It is important to remember that most social skills are dependent on a feeling of positive self-worth.

Qualities of Leadership

Here is what Field Marshal Sam Manekshaw said on Qualities of Leadership.

Professional competence, moral and physical courage, -absolute impartiality and loyalty are the ingredients of good leadership. What we lack as a nation is discipline and that is the most essential quality to lead others.”

Ten-step Recipe for Success

  • Identify your strengths.
  • Be positive in your thoughts about yourself.
  • Review your past successes.
  • Have a vision.
  • Turn the vision into a well-defined, attainable objective.
  • Persevere towards the objective.
  • Keep appreciating yourself.
  • And finally, learn to celebrate success when it comes your way.

Conclusion

Much as we desire to excel, we hardly find time to think as to how to go about it. Busy as we are in this fast-paced life, it is understandable. Proper education and overall development of the personality are the keys to real progress. The desire to put together several thoughts that would help in this regard has prompted the writing of this article.

The way we conduct ourselves in the various transactions dally from the time we get up till we go to bed depends on our manners, etiquette and knowledge of desirable practices. All these will contribute to the overall well being which in turn will influence the quality and quantity of performance and achievement.

Learning and improvement are continuous processes. One should try to develop himself/herself and his/her people. We should unremittingly work for the good of mankind. The philosophy should be that simplicity is the best policy alongwith honesty and selfless service.

It is hoped that the points indicated in this article and the following words would enable readers to continue their efforts and reach greater heights:

  • We should keep our overall objective in view and work relentlessly to overcome the obstacles on the way.
  • “Men, like nails, lose their usefulness when they lose direction and bend.”
  • God grant me the serenity to accept the things I cannot change, the courage to change the things I can, and the wisdom to know the difference.

References:

en.wikipedia.org/wiki/Personality_development

persmin.gov.in

www.womensweb.in

www.mysuccesspoint.com

 

A CRITICAL STUDY OF CONCERNS, VISION AND RELEVANCE OF TEACHER EDUCATION

A CRITICAL STUDY OF CONCERNS, VISION AND RELEVANCE OF TEACHER EDUCATION

Dr. Rajnish Pandey
Reader, Department of Education
MIT,Dhalwala

 

Abstract

The critical presentation and the rationalization of the topic ‘A Critical Study of Concerns, Vision and Relevance of Teacher Education’ shows that the teacher education is the greatest concern to every one in the country. At the same time the contributions of ore than 32 lakh teachers towards reshaping the education in the country is unforgettable. With their efforts the number of schools have grown to more than ten lakhs. Education sector is an industry in India, which percentage of literacy has reached around 74%. The teacher is the crux and the custodian of the society and a bonafide patron of the national development to be processed through education.

Register to read more...

 
  •  Start 
  •  Prev 
  •  Next 
  •  End 

Page 1 of 3

Login Form

Notice Board